रेशमी से खयाल तुम्हारे
मुझे छूते हैं चांदनी से छनते हुए
और मैं अंधियारी रात की मुसाफिर
तराशती हूँ तुम्हें हवा के झोंको के बीच
सोचती हूँ सीपियों में कैद
कहीं मिल जाओ तुम मुझे
और उठा के ले आऊ मैं तुम्हें
सहेजकर रख देने के लिए..
तुम्हारी उलझनों को लगाम देदू
तुम्हे हवा में ले चालू प्यार की
उस रोशन असमा के नीचे
खाहिश हैं जिसकी कईओ को
तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ जोड़
होंठो पर लिख दू तुम्हारे
अपनी कहानी..
और अपना ये सुर्खपन बाँट दू तुम्हे..
Wednesday, December 16, 2015
ख़याल तुम्हारा...
Saturday, October 31, 2015
यें बारिशें ...
मुझे बारिश बहुत पसंद हैं। क्यों पसंद हैं इस बात का जवाब नहीं हैं पर बहुत पसंद हैं। टप टप बरसती हुई झट से खालीपन को भर देती हैं। बरसों से सुने पडे वीराने में झट से शोर की गूंज पहुँचा देती हैं। झरने बहने लगते हैं पल में।
खिड़की से बारिश को देखना, देखते रहना , एकटक बारिश की बूंदो को महसूस करना , पेड़ो से छन छन करती बूंदे , हरापन दे जाती हैं ये बारिश।
अभी बारिश हो रहीं थी मेरे सामने। झूम झूम के बादल बरसे और चुप हो गये. पानी भर गया हैं यहाँ छोटी सी जगह में। तालाब बन गया हैं छोटा और इस ठहराव में कुछ कुछ देर में टप से कोई रह चुकी बूँद टपकती हैं और शांति से बैठी पानी की लहरें दौड़ पड़ती हैं जैसे की कोई रास्ता तय कर रही हो। इस पार से उस पार जाती ये लहरें मन पैदा कर देती हैं और ऊपर फैला ये आसमान पानी पर खड़ा अपना प्रतिबिंब निहार रहा हों। लहरों को देखकर मेरा मन भी लहर बन जाना चाहता हैं , मैं भी पानी पर चलने का आनंद लेना चाहती हूँ। इस छोटे से तालाब में बीच बीच में पड़े इन ईंट के टुकड़े भी धुल गए हैं वहीँ बीच में रुके हुए हैं , जैसे की छोटे से तालाब का छोटा सा जहाज़। अठखेलियाँ करती हुई ये बूँदे शांति से किसी प्रेमिका की तरह परेशान कर रही हैं इसे। हर कोई रुक जाता हैं इस बारिश को देखने , कोई देर कोई सवेर , को अपनी तरफ खींच पाती हैं बारिशें। पानी भरा ऐसा फ़ासला मैं भी तय करना चाहती हूँ।
मैं भी बूँद हो जाना चाहती हूँ। मैं भी बारिश हो जाना चाहती हूँ।--खामोशियाँ ....
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