Thursday, January 12, 2017

निर्मोही

घर से दूर जाने के दो दिन पहले दादा भाई के संग पार्क की बेंच पर बैठी थी। वो बोले की मैं समझदार हूँ, मुझे कभी कुछ समझाने की जरूरत नहीं पड़ी इतने सालों में..लेकिन अब मैं इतनी दूर जा रही हूँ तो सोचा कुछ कहूँ..
तू सबकुछ करना..जो मर्जी में आए.. जैसे जीना चाहे..बस मेरी गुड़ियाँ किसी से मोह मत लगाना..ये मोह अगर लग गया और वो इंसान/चीज़ तुझसे दूर चली गयी तो फाँस सा कुछ चुभ जाएगा तेरे अंदर और फिर दुनिया कितनी भी खूबसूरत हो रास नहीं आएगी..इसलिये कभी मोह मत लगाना..
जीना, खूब जीना, मिलना, घूमना, अनुभव करना सबकुछ लेकिन अपने आप को बांध मत लेना किसी खूंटे से..क्योंकि कुछ भी स्थाई नहीं होता और हम पहले ही इतनी बंधनो में बंधे है की उन्हें छुड़ाने की कोशिश करें तो जीना दूभर हो उठेगा..इसलिए तू निर्मोही जीना..तू खूब उड़ना, तू खूब रंग भरना बस किसी चीज़ को जकड कर, अपनी भावनाओं की दासी मत बन जाना।
और मैं जी उठी, मैं खूब उड़ी, नए आसमान देखे, मन की अठखेलियां देखी..खूब पढ़ी, खूब बढ़ी और अन्तिम वर्ष के साथ ही जब उड़ान रोककर नीचे आने लगी तो पक्षियों के एक जोड़े पर मुग्ध सी हो उठी..जाते जाते वो पंछी अपना रंग भर गया... जकड़ा ही गयी मैं एक सुनहरी कैद में..अगर उसे पाने की कोशिश करती तो इसका वो साथी अकेलेपन से मर जाता, लेकिन आसमान में उड़ते हुए दोनों को देख भी तो नहीं पा रहीं थी..इतनी सेहनशीलता भी नहीं है मुझमें..
कुछ बर्बाद भी ना हो और वो पंछियों का जोड़ा भी खुश रहे और दादा भाई की सीख भी..मैंने अंधी हो जाना चुन लिया..
अब मुझे आसमान में कोई पंछी नहीं दिखता.. वो तो यही उड़ रहा अपने साथी के साथ..मैंने ही आँखे बंद कर ली...
मैं निर्मोही...निर्मोही..
भला निर्मोही कहा पीछे मुड़ कर देखते है?
बढ़ चली दिल में एक गांठ बांधे 😊😊

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