मैं तुम्हारी खोज में निकलती हूँ, हर जगह तलाशती हूँ तुमको, घर से सोच के निकलती हूँ की आज पा लुंगी और कल जरूर मिलेगा कहती वापस लौट आती हूँ। तुम्हें ढूंढती हु मैं उगते सूरज की लालिमा में, मिलते हो तुम मुझे तकिये पर सूखे धब्बे बन। तुम्हे ढूंढती हु मैं अपने उस नारंगी कुर्ते में जो तुम्हें पसंद था और तुम मिलते हो मुझे उस लाल लहरिये में जो घडी कर रखा है कभी ओढ़े जाने के इंतजार में, तुम्हें ढूंढती हूँ मैं संगीत की हर धुन, हर साज़,हर राग में और मिलते हो तुम मुझे बहती हवा के शोर, लहरों के हिलोरों में। मैं मुस्कुराती हूँ और ढूंढती हूँ तुम्हें अपने खिले होंठो में पर होंठों के सहारे नहीं, तुम मुझे मिलते हो आँखों में, मैं तराशती हूँ तुम्हें खुद में, मिलते हो तुम मुझे यादों के अंदर , पाती हूँ 'हमें' मैं युगलों के अंदर, पाती हूँ 'हमें' मैं पुराने खतों में।
कभी नज़्म में कभी वक़्त बनकर..
कभी किरदार में कभी कोई कहानी बनकर..
कभी ओंस बन तो कभी आंसू बन..
कभी हवा बन तो कभी मौसम बन..
मिल जाते हो तुम मुझे सड़क के किनारे कभी..
दिख जाते हो मुझे ठहरते पानी बन झीलों के करीब..
झांक पड़ते हो कभी कांच के अंदर से..
कभी धुन बन मेरे अंदर रम जाते हो..
कौन कहता है की तुम अब नहीं हो
पा लेती हूँ तुम्हे हर रोज कही न कहीं
कल सच्ची में मिलेगा कहकर घर लौट जाती हूँ।
~अतरंगिनी।