Monday, October 17, 2016

दुःख

दुख भरे पड़े है
आँखों में..
आँखों की पुतलियों के पीछे..
कुछ नामों की सतह पर..
कुछ आबादियों पर..
कुछ धड़कनों में कैद..
कुछ ऊँचा उठा उपर..
भरा हुआ है दुख;
एक एक उच्छ्वास में
एक एक श्वास में
शब्दों में, अर्थ में
और खुशियों में
मुस्कुराते चेहरे के कारण
दुख है..
दुख है अपने अंदर थामे रखा
जैसे उड़ते हुए गुब्बारे की डोर को
बांधा हुआ हो सिरे से
सीया हुआ है
होंठो को
अधर खुले तो दुख
बाहर आ जाएगा
आँखे मूंदी हुई है
छलकेगा एक एक बूँद बन
रिसेगा हर स्वास के साथ
फफक पड़ेगी देह
दुख भरे पड़े है
दीमाग की स्मृतियों में
उस धधकती देह में
दुख जल रहे है
सपने तार तार हो रहे है
रंग सुख रहे
फूल भी, तोहफे भी..
आज सन्नाटा कर रहा हिसाब
कोपभवन में लेटकर
गणना की जाती थी जिस दुख की..
कहाँ कितना बाकी है
कहाँ है अभी
और सूजन ;
और जलन;
और खारी बूंदे;
कि दुख भरे पड़े है।

~Atrangini

Friday, March 18, 2016

तलाश तुम्हारी

मैं तुम्हारी खोज में निकलती हूँ, हर जगह तलाशती हूँ तुमको, घर से सोच के निकलती हूँ की आज पा लुंगी और कल जरूर मिलेगा कहती वापस लौट आती हूँ। तुम्हें ढूंढती हु मैं उगते सूरज की लालिमा में, मिलते हो तुम मुझे तकिये पर सूखे धब्बे बन। तुम्हे ढूंढती हु मैं अपने उस नारंगी कुर्ते में जो तुम्हें पसंद था और तुम मिलते हो मुझे उस लाल लहरिये में जो घडी कर रखा है कभी ओढ़े जाने के इंतजार में, तुम्हें ढूंढती हूँ मैं संगीत की हर धुन, हर साज़,हर राग में और मिलते हो तुम मुझे बहती हवा के शोर, लहरों के हिलोरों में। मैं मुस्कुराती हूँ और ढूंढती हूँ तुम्हें अपने खिले होंठो में पर होंठों के सहारे नहीं, तुम मुझे मिलते हो आँखों में, मैं तराशती हूँ तुम्हें खुद में, मिलते हो तुम मुझे यादों के अंदर , पाती हूँ 'हमें' मैं युगलों के अंदर, पाती हूँ 'हमें' मैं पुराने खतों में।
कभी नज़्म में कभी वक़्त बनकर..
कभी किरदार में कभी कोई कहानी बनकर..
कभी ओंस बन तो कभी आंसू बन..
कभी हवा बन तो कभी मौसम बन..
मिल जाते हो तुम मुझे सड़क के किनारे कभी..
दिख जाते हो मुझे ठहरते पानी बन झीलों के करीब..
झांक पड़ते हो कभी कांच के अंदर से..
कभी धुन बन मेरे अंदर रम जाते हो..
कौन कहता है की तुम अब नहीं हो
पा लेती हूँ तुम्हे हर रोज कही न कहीं
कल सच्ची में मिलेगा कहकर घर लौट जाती हूँ।

~अतरंगिनी।

Wednesday, March 2, 2016

चाँद

कोहनियों के ब़ल चलकर
चाँद आज कितना करीब आया है
कांच की खिड़की से सरकती
बारिश की बूंदों की
कतारें और शीशे के इस
पार भीगा हुआ मेरा मन
चान्दिनी में नहाये हुए कुछ ख्वाब
यादों की चादर भिगोने लगे
आँखों के समंदर में
घुलकर बह निकली एक
तम्मना तुमसे जुड़ने की
थरथराते होटों पे तुम्हारे
लबों का एहसास
एक गर्माहट से भर गयी
सर्द तूफानी रात में।

~अज्ञात।

Saturday, January 23, 2016

तुम्हें अलविदा..

कभीकभी मेरा मन तुम्हें आवाज़ दे उठता है जब सुबह उठ पहला ख़याल तुम होते हो नींदों में घुल सपनों में आते हो जब हरी हो जाती है बरसों पुरानी कोई याद या बरबस ही दिख पड़ता है कोई तुम जैसा या तुम जैसा शर्ट या तुम जैसी मुस्कराहट या तुम्हारे जैसी आवाज़ अगर प्यार से पुकार उठता है कोई "भावना" तो दिल भूल जाता है के अब तुम नहीं हो और पलट कर उस आवाज़ की तलाश करने लग जाता है ओ छोड़ कर जाने वाले क्या तुम मुझे इस बात का जवाब दे सकते हो की कब तुम अपनी यादों की गठरी बांधकर मेरे दिल के कोने को अलविदा कहोगे कब जकड़ कर बैठे मेरे दिमाग के उस हिस्से को खली करोगे क्योंकि मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद होना चाहती हूँ उड़ने के लिए फीतों को खोल देना चाहती हूँ विस्मृत कर देना चाहती हु तुम्हारे साथ बिताये सारे पलो को क्योंकि मैं भी उड़ना चाहती हु कोई सपने मेरे भी थे उनपर पड़ी धूल हटाना चाहती हु आज़ाद हो तुम, आज़ाद रहो मुझे क्यों अपनी यादों का ग़ुलाम बनाते हो ओ छोड़ कर जाने वाले ले जाओ ले जाओ अपने साथ अपना हर रंग अपना हर शब्द और अपना हर गीत और तुम्हारा हर वादा जिनकी स्मृति मुझे बेचैनी से अधीर रात में उठा देती है गुमशुदा हो जाना की मेरी आत्मा का कोई भी अंश तुम्हें ढूंढ न पाए तुम्हारी तलाश में गोते तो लगाये पर कभी कुछ खोज न पाए क्योकिं कुछ भरने के लिए पात्र का खली होना जरुरी है और मेरे तो ज़र्रे ज़र्रे में आज भी तुम झलकते हो पर अब बहुत हो गया मेरा आसमान मुझे बुला रहा है और मैं जकड से छूटकर हवा के संग उसी लय में उड़ान भरना चाहती हूँ बस यही आरज़ू है के लौट जाओ जहा से आए थे जहाँ से उद्गम किया था वहाँ समाहित कर दो खुद को लौट जाओ मेरे प्रिय तुम्हें अलविदा...

Friday, January 22, 2016

सच...

तुम जानते नहीं हो की मुस्कुराते चेहरे के पीछे का राज़ क्या हैं। ये जो खिलखिलाहटें सुनाई देती है ना, ये जो ज़्यादा बोलने की आदत है। ये सब वो नहीं है जो हैं। ये सब कुछ और ही है। सच वो है जो छुपा हुआ है, सच वो है जो गाढ़ दिया गया है कही किसी ज़मीन में चांदनी रात की गवाही में, होंठो के पीछे कैद है सच, किसी आँखों में दुबका हुआ है। जान भी नहीं पाओगे की सीने में दबाये बैठे कैसे अंदर ही अंदर जी जल उठता है इस सच से।कैसे 8 पहर केवल इसे दबा कर रखने में बीत जाते है। दिल का ये मैख़ाना खाली लगता है ना तुम्हें, कभी करीब से देखना इसमें कितनी चीखें भरी पड़ी है, इसमें कितने सच दफ़्न है। दिल, दिल रहा ही कहाँ है अब, ये किसी कब्रिस्तान से कम नहीं जहाँ हिस्से पड़े है हजार किस्सों के, जहा उजाला है पर रोशनी नहीं, जहाँ तमाशे है जिंदगी के खेले और जहाँ ख़ामोशी है, शिकायतों भरी खामोशी। लब खामोश है अब, आँखों ने भी बोलना बंद कर दिया है क्योंकि जो बयां हुआ वो समझ नही पाये तो मेरी ख़ामोशी समझना तुम्हारे बस की बात नहीं।
बस तो फिर खुशिओं का स्वांग रचे इस मुस्कुराते चेहरे से घुलो मिलो, जीतो हरो और गलती से भी अंदर न झांकना।
ये एक दरिया है जो तुम्हे अपने अंदर से निकलने नहीं देगा।

तुम्हारी ख़ामोशी।