दुख भरे पड़े है
आँखों में..
आँखों की पुतलियों के पीछे..
कुछ नामों की सतह पर..
कुछ आबादियों पर..
कुछ धड़कनों में कैद..
कुछ ऊँचा उठा उपर..
भरा हुआ है दुख;
एक एक उच्छ्वास में
एक एक श्वास में
शब्दों में, अर्थ में
और खुशियों में
मुस्कुराते चेहरे के कारण
दुख है..
दुख है अपने अंदर थामे रखा
जैसे उड़ते हुए गुब्बारे की डोर को
बांधा हुआ हो सिरे से
सीया हुआ है
होंठो को
अधर खुले तो दुख
बाहर आ जाएगा
आँखे मूंदी हुई है
छलकेगा एक एक बूँद बन
रिसेगा हर स्वास के साथ
फफक पड़ेगी देह
दुख भरे पड़े है
दीमाग की स्मृतियों में
उस धधकती देह में
दुख जल रहे है
सपने तार तार हो रहे है
रंग सुख रहे
फूल भी, तोहफे भी..
आज सन्नाटा कर रहा हिसाब
कोपभवन में लेटकर
गणना की जाती थी जिस दुख की..
कहाँ कितना बाकी है
कहाँ है अभी
और सूजन ;
और जलन;
और खारी बूंदे;
कि दुख भरे पड़े है।
~Atrangini