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Friday, January 22, 2016

सच...

तुम जानते नहीं हो की मुस्कुराते चेहरे के पीछे का राज़ क्या हैं। ये जो खिलखिलाहटें सुनाई देती है ना, ये जो ज़्यादा बोलने की आदत है। ये सब वो नहीं है जो हैं। ये सब कुछ और ही है। सच वो है जो छुपा हुआ है, सच वो है जो गाढ़ दिया गया है कही किसी ज़मीन में चांदनी रात की गवाही में, होंठो के पीछे कैद है सच, किसी आँखों में दुबका हुआ है। जान भी नहीं पाओगे की सीने में दबाये बैठे कैसे अंदर ही अंदर जी जल उठता है इस सच से।कैसे 8 पहर केवल इसे दबा कर रखने में बीत जाते है। दिल का ये मैख़ाना खाली लगता है ना तुम्हें, कभी करीब से देखना इसमें कितनी चीखें भरी पड़ी है, इसमें कितने सच दफ़्न है। दिल, दिल रहा ही कहाँ है अब, ये किसी कब्रिस्तान से कम नहीं जहाँ हिस्से पड़े है हजार किस्सों के, जहा उजाला है पर रोशनी नहीं, जहाँ तमाशे है जिंदगी के खेले और जहाँ ख़ामोशी है, शिकायतों भरी खामोशी। लब खामोश है अब, आँखों ने भी बोलना बंद कर दिया है क्योंकि जो बयां हुआ वो समझ नही पाये तो मेरी ख़ामोशी समझना तुम्हारे बस की बात नहीं।
बस तो फिर खुशिओं का स्वांग रचे इस मुस्कुराते चेहरे से घुलो मिलो, जीतो हरो और गलती से भी अंदर न झांकना।
ये एक दरिया है जो तुम्हे अपने अंदर से निकलने नहीं देगा।

तुम्हारी ख़ामोशी।