Wednesday, December 16, 2015

ख़याल तुम्हारा...

रेशमी से खयाल तुम्हारे
मुझे छूते हैं चांदनी से छनते हुए
और मैं अंधियारी रात की मुसाफिर
तराशती हूँ तुम्हें हवा के झोंको के बीच
सोचती हूँ सीपियों में कैद
कहीं मिल जाओ तुम मुझे
और उठा के ले आऊ मैं तुम्हें
सहेजकर रख देने के लिए..
तुम्हारी उलझनों को लगाम देदू
तुम्हे हवा में ले चालू प्यार की
उस रोशन असमा के नीचे
खाहिश हैं जिसकी कईओ को
तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ जोड़
होंठो पर लिख दू तुम्हारे
अपनी कहानी..
और अपना ये सुर्खपन बाँट दू तुम्हे..