Friday, January 6, 2017

स्तब्ध...

किसी से बात की हो और चंद घंटो बाद मालूम हो की वो अब उस दुनिया में नहीं हैं..स्तब्धता.. हा स्तब्धता का ऐसा निर्मम सा एहसास इससे ज्यादा अच्छे तरीके से कोई और घटना शायद ही दे सके|  दुःख एवं आश्चर्य का ये निचोड़ बहुत तकलीफदेह सा होता हैं| कोई कैसे मर सकता हैं.. कितनी दुविधयों भरा प्रश्न हैं कितना कचोटने वाली बात हैं| प्रश्नचिन्ह ही प्रश्नचिन्ह ?? जवाब मांगे भी तो किससे? पूछे भी तो किससे ? वो जो जवाब दे सकता था, वो जो बता सकता था वो तो अब वजूद ही नहीं रखता | वो तो हैं ही नहीं, वो तो हवा में मिल गया| कितना घुटन भरी भावना हैं ये.. साथ ही साथ ये सच्चा बोध कराने में पुर्णतः सक्षम होता हैं की ये सब जो हमारे सामने हैं ये दुनिया, ये लोग, ये जीवन.. कुछ भी..कुछ भी चीज़ का कोई भरोसा ही नहीं| कब सब कुछ छोड़ ये प्राण पखेरू उड़ चले हम नहीं जानते| कितना कुछ सोचते हैं भविष्य के लिए कितनी तैय्यारियाँ कितने सपने देखते हैं| और उन सब में ये सोचना भूल ही जाते हैं की जीना भी हैं| हम में से लगभग आधा प्रतिशत लोग बस चल रहे हैं.. वो नहीं कर रहे हैं जो करना चाहते हैं, हाँ मैं भी उन्ही में से एक हूँ| इन वाकियो से गहरा अघात सा लगता हैं की न जाने किस भविष्य के सपने में इतने व्यस्त हैं जो होगा भी या नहीं हम नही जानते| आज को भूले बैठे हैं, कल के लिए|  ये प्रकृति बार बार हमें सिखाने की कोशिश करती हैं, और हम अनजान बन भटकते रहते हैं माया के बीच और एक दिन ऐसे ही गायब हो जाते हैं दुनिया से , तब हमारी to do list, हमारे कपडे, हमारी सारी चीज़े जिन्हें सहेजने में ही जिंदगी बीता दी वो युही धरे के धरे रह जाते हैं  

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