Saturday, January 23, 2016
तुम्हें अलविदा..
कभीकभी मेरा मन
तुम्हें आवाज़ दे उठता है
जब सुबह उठ पहला ख़याल तुम होते हो
नींदों में घुल सपनों में आते हो
जब हरी हो जाती है
बरसों पुरानी कोई याद
या बरबस ही दिख पड़ता है
कोई तुम जैसा
या तुम जैसा शर्ट
या तुम जैसी मुस्कराहट
या तुम्हारे जैसी आवाज़
अगर प्यार से पुकार उठता है कोई "भावना"
तो दिल भूल जाता है के
अब तुम नहीं हो
और पलट कर उस आवाज़ की तलाश करने लग जाता है
ओ छोड़ कर जाने वाले
क्या तुम मुझे इस बात का जवाब दे सकते हो
की कब तुम अपनी यादों की गठरी बांधकर
मेरे दिल के कोने को अलविदा कहोगे
कब जकड़ कर बैठे मेरे दिमाग के उस हिस्से को खली करोगे
क्योंकि मैं भी तुम्हारी तरह आज़ाद होना चाहती हूँ
उड़ने के लिए
फीतों को खोल देना चाहती हूँ
विस्मृत कर देना चाहती हु
तुम्हारे साथ बिताये सारे पलो को
क्योंकि मैं भी उड़ना चाहती हु
कोई सपने मेरे भी थे
उनपर पड़ी धूल हटाना चाहती हु
आज़ाद हो तुम, आज़ाद रहो
मुझे क्यों अपनी यादों का ग़ुलाम बनाते हो
ओ छोड़ कर जाने वाले
ले जाओ
ले जाओ अपने साथ
अपना हर रंग
अपना हर शब्द
और अपना हर गीत
और तुम्हारा हर वादा
जिनकी स्मृति मुझे
बेचैनी से अधीर
रात में उठा देती है
गुमशुदा हो जाना
की मेरी आत्मा का कोई भी अंश
तुम्हें ढूंढ न पाए
तुम्हारी तलाश में गोते तो लगाये
पर कभी कुछ खोज न पाए
क्योकिं कुछ भरने के लिए
पात्र का खली होना जरुरी है
और मेरे तो ज़र्रे ज़र्रे में
आज भी तुम झलकते हो
पर अब बहुत हो गया
मेरा आसमान मुझे बुला रहा है
और मैं जकड से छूटकर
हवा के संग उसी लय में
उड़ान भरना चाहती हूँ
बस यही आरज़ू है
के लौट जाओ
जहा से आए थे
जहाँ से उद्गम किया था
वहाँ समाहित कर दो खुद को
लौट जाओ
मेरे प्रिय
तुम्हें अलविदा...
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