Friday, January 22, 2016

सच...

तुम जानते नहीं हो की मुस्कुराते चेहरे के पीछे का राज़ क्या हैं। ये जो खिलखिलाहटें सुनाई देती है ना, ये जो ज़्यादा बोलने की आदत है। ये सब वो नहीं है जो हैं। ये सब कुछ और ही है। सच वो है जो छुपा हुआ है, सच वो है जो गाढ़ दिया गया है कही किसी ज़मीन में चांदनी रात की गवाही में, होंठो के पीछे कैद है सच, किसी आँखों में दुबका हुआ है। जान भी नहीं पाओगे की सीने में दबाये बैठे कैसे अंदर ही अंदर जी जल उठता है इस सच से।कैसे 8 पहर केवल इसे दबा कर रखने में बीत जाते है। दिल का ये मैख़ाना खाली लगता है ना तुम्हें, कभी करीब से देखना इसमें कितनी चीखें भरी पड़ी है, इसमें कितने सच दफ़्न है। दिल, दिल रहा ही कहाँ है अब, ये किसी कब्रिस्तान से कम नहीं जहाँ हिस्से पड़े है हजार किस्सों के, जहा उजाला है पर रोशनी नहीं, जहाँ तमाशे है जिंदगी के खेले और जहाँ ख़ामोशी है, शिकायतों भरी खामोशी। लब खामोश है अब, आँखों ने भी बोलना बंद कर दिया है क्योंकि जो बयां हुआ वो समझ नही पाये तो मेरी ख़ामोशी समझना तुम्हारे बस की बात नहीं।
बस तो फिर खुशिओं का स्वांग रचे इस मुस्कुराते चेहरे से घुलो मिलो, जीतो हरो और गलती से भी अंदर न झांकना।
ये एक दरिया है जो तुम्हे अपने अंदर से निकलने नहीं देगा।

तुम्हारी ख़ामोशी।

Wednesday, December 16, 2015

ख़याल तुम्हारा...

रेशमी से खयाल तुम्हारे
मुझे छूते हैं चांदनी से छनते हुए
और मैं अंधियारी रात की मुसाफिर
तराशती हूँ तुम्हें हवा के झोंको के बीच
सोचती हूँ सीपियों में कैद
कहीं मिल जाओ तुम मुझे
और उठा के ले आऊ मैं तुम्हें
सहेजकर रख देने के लिए..
तुम्हारी उलझनों को लगाम देदू
तुम्हे हवा में ले चालू प्यार की
उस रोशन असमा के नीचे
खाहिश हैं जिसकी कईओ को
तुम्हारा नाम अपने नाम के साथ जोड़
होंठो पर लिख दू तुम्हारे
अपनी कहानी..
और अपना ये सुर्खपन बाँट दू तुम्हे..

Saturday, October 31, 2015

यें बारिशें ...




मुझे बारिश बहुत पसंद हैं। क्यों पसंद हैं इस बात का जवाब नहीं हैं पर बहुत पसंद हैं। टप टप बरसती हुई झट से खालीपन को भर देती हैं।  बरसों से सुने पडे वीराने में झट से शोर की गूंज पहुँचा देती हैं। झरने बहने लगते हैं पल में। 

खिड़की से बारिश को देखना, देखते रहना , एकटक  बारिश की बूंदो को महसूस करना , पेड़ो से छन छन करती बूंदे , हरापन दे जाती हैं ये बारिश। 

अभी बारिश हो रहीं थी मेरे सामने। झूम झूम के बादल बरसे और चुप हो गये. पानी भर गया हैं यहाँ छोटी सी जगह में। तालाब बन गया हैं छोटा और इस ठहराव में कुछ कुछ देर में टप से कोई रह चुकी बूँद टपकती हैं और शांति से बैठी पानी की लहरें दौड़ पड़ती हैं जैसे की कोई रास्ता तय कर रही हो।  इस पार से उस पार जाती ये लहरें मन  पैदा कर देती हैं और ऊपर फैला ये आसमान पानी पर खड़ा अपना प्रतिबिंब निहार रहा हों।  लहरों को देखकर मेरा मन भी लहर बन जाना चाहता हैं , मैं भी पानी पर चलने का आनंद लेना चाहती हूँ।  इस छोटे से तालाब में बीच बीच में पड़े  इन ईंट के टुकड़े भी धुल गए हैं वहीँ बीच में रुके हुए हैं , जैसे की छोटे से तालाब का छोटा सा जहाज़। अठखेलियाँ करती हुई ये बूँदे शांति से किसी प्रेमिका की तरह परेशान कर रही हैं इसे।  हर कोई रुक जाता हैं इस बारिश को देखने , कोई देर कोई सवेर ,  को अपनी तरफ खींच  पाती हैं बारिशें।   पानी भरा ऐसा फ़ासला मैं भी तय करना चाहती हूँ। 
             मैं भी बूँद हो जाना चाहती हूँ। मैं भी बारिश हो जाना चाहती हूँ।  
--खामोशियाँ ....